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हिंदू धर्म में कुंभ का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुंभ में स्नान या शाही स्नान करने से भक्त की सभी परेशानियां दूर हो जाती है। कुंभ के पीछे की कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी है। पढ़ें
सागर मंथन हुआ। अंतत: धन्वंतरि अमृतघट को लेकर उपस्थित हुए। सागर मंथन से पूर्व ही नारायण ने भगवान को यह विश्वास दिलाया था कि वह अमृत असुरों के हाथ न लगने देंगे, लेकिन ऐसा तभी होगा, जब उन्हें यह विश्वास हो जाए कि देवता भी अपने अधिकार की रक्षा के लिए प्रयत्न कर रहे हैं।
भगवान को स्वयं को सिद्ध करना था। उन्होंने निर्णय लिया कि इंद्रपुत्र जयंत अमृत कलश छीन कर भाग जाओ। दौड़ने में जयंत का मुकाबला सिर्फ पवन देव ही कर सकते थे। भगवान के इशारे पर इंद्रपुत्र जयंत समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश को लेकर उड़ गए। पर दातनों ने जयंत को पकड़ ही लिया। अमृत कलश के लिए देव-असुरों में 12 दिन तक युद्ध होता रहा। इस छीना-झपटी में अमृत छलका और प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन वसिक, इन चार स्थानों पर कुछ बूंदें गिरीं। प्रयाग गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर, हरिद्वार गंगातट पर, उज्जैन शिप्रा और नासिक गोदावरी के तट पर बसा हुआ है।
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इस छीना-झपटी के बीच चंद्रमा ने घट से अमृत को बाहर गिरने से, सूर्य ने घट को फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से & शनि ने देवेन्द्र के भय से बचाया। अंतत: श्रीहरि ने मोहिनी रूप धर कर कर वितरण का दायित्व लिया। देवों ने असुरों से 12 दिनों तक युद्ध किया था। उनके 12 दिन मनुष्यों के 12 वर्ष के दूषित होते हैं। इसलिए कहा जाता है कि कुंभ भी 12 होते हैं। उनमें से चार पृथ्वी पर व शेष आठभु देवलोक में होते हैं।
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कुंभ की शुरुआत संतों के स्नान से होती है। पुराणों में प्रसंग आता है, जब भागीरथ ने गंगा से स्वर्ग से धरती पर आने की प्रार्थना की तो गंगा ने पूछा कि लोग उनके जल में स्नान करके पापों से तो मुक्ति पा लेंगे, लेकिन उस पाप को वह कैसे धोएगी? भागीरथ बोले, ‘आत्मतीर्थ में आए ब्रह्मज्ञानी जब आपके जल में स्नान करेंगे, तब उनके स्पर्श से आपके पाप नष्ट हो जाएंगे, आप पवित्र हो जाएंगे।’ तन, मन व मति के दोषों की निवृत्ति के लिए तीर्थ और कुंभ पर्व हैं। तुलसीदास जी कहते हैं- वेद समुद्र हैं, ज्ञान मंदराचल है और संत देवता हैं, जो उस समुद्र को मथ कर कथारूपी आश्रय हैं। उस अमृत में भक्ति और सत्संग रूपी मधुरता बसती है। जिस समय में चंद्र, सूर्य, गुरु आदि ने कलश की रक्षा की थी, उस समय योजनाओं की जो स्थिति थी, उन राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्य आदि ग्रह जब आते हैं, तब तक का योग होता है। मान्यता है कि 144 वर्ष बाद स्वर्ग में भी कुंभ आयोजन होता है। इसलिए उस वर्ष प्रयाग में महाकुंभ का आयोजन होता है। ।
राजन प्रकाश * (लेखक धार्मिक पोर्टल व एप प्रभु शरणं के संचालक हैं)
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