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शाहजहांपुर में परम्परागत तरीके से निकला 'लाट साहब' का जुलूस, जानें- कैसे शुरू हुई परंपरा

शाहजहांपुर में परम्परागत तरीके से निकला ‘लाट साहब’ का जुलूस, जानें- कैसे शुरू हुई परंपरा

by Sneha Shukla

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शाहजहाँपुर: उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में होली पर्व पर निकलने वाला ‘लाट साहब’ का जुलुस सोमवार को परम्परागत तरीके से निकाला गया। पुलिस सूत्रों ने बताया कि शहर कोतवाली क्षेत्र से बाहर बड़े लाट साहब का जुलुस सबसे पहले फूलमती मंदिर पहुंचा जहां लाट साहब ने पूजा-अर्चना की। उसके बाद जुलुस कोतवाली पहुंच गई जहाँ परंपरा के तहत कोतवाल ने लाट साहब को सलामी दी। सलामी लेने के बाद लाट साहब ने कोतवाल प्रवेश सिंह से साल भर हुए अपराधों का ब्योरा मांगने की रिवायत की पूरी की। उसके बाद कोतवाल ने परम्परा के अनुसार लाट साहब को शराब की बोतल और नकद धनराशि दी।

हेलीकॉप्टर भी गया
कोतवाली से जुलुस निकलकर चार खंबा और केरूगंज होते हुए कचहरी मार्ग से विश्वनाथ मंदिर पहुंच गए, जहां फिर लाट साहब ने पूजा अर्चना की। उसके बाद घंटाघर होते हुए ये जुलुस बंगला के नीचे सम्पन्न हो गए हैं। जुलुस के दौरान लाट साहब को एक बैलगाड़ी पर तख्त के ऊपर कुर्सी डालकर बैठाया गया था। उन्हें निशान नहीं लगे, इसलिए हेलीकाप्टर भी लगाया गया था। उनके सेवक बने दो होरियारे झाड़ू से हवा करते रहे और जूतों की माला पहने लाट साहब पर होरियारे ‘होलिका माता की जय’ बोलते हुए जूते बरसाते नजर आए।

पुलिस रही मुस्तैद
पुलिस अधीक्षक एस आनंद ने बताया कि जुलुस को सकुशल संपन्न कराने के लिए पूरे जिले के 22 थानों से और पुलिस लाइन से पुलिस बल के अलावा एक कंपनी आरएएफ, दो कंपनी पीएसी के साथ 225 मजिस्ट्रेट जिनमें प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस बल शामिल हैं, डेढ़ हजार पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।

अधिकारियों की ड्यूटी लगाई गई
इस बीच, अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) संजय कुमार ने बताया कि होली पर शहर में निकलने वाले छोटे लाट साहब के ई और जुलुस शांतिपूर्वक संपन्न हो गए। ये जुलुसों में भी धार्मिक स्तर के अधिकारियों की ड्यूटी लगाई गई थी।

लाट साहब को जूते मारते हैं
आयोजन समिति के एक सदस्य ने बताया कि इस बार दिल्ली से आ रहे लाट साहब को रोककर मुरादाबाद से लाट साहब को बुलाया गया था। लाट साहब बनाए जाने वाले व्यक्ति को एक निश्चित धनराशि तो दी ही जाती है साथ ही आयोजन समिति के सदस्य भी इनाम के तौर पर हजारों रुपए देते हैं। उन्होंने बताया कि लाट साहब की पहचान छिपाने के लिए चेहरे और हाथ पर कालिख लगाई जाती है, हेलीकॉप्टर पहनाया जाता है। जुलुस के पूरे मार्ग पर होरियारे ‘लाट साहब की जय’, ‘होलिका माता की जय’ बोलते हुए लाट साहब को जूते मारते हैं।

ऐसी शुरू हुई परंपरा
स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज में इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ। विकास खुराना ने लाट साहब के जुलुस की परंपरा के बारे में बताया कि शाहजहाँपुर शहर की स्थापना करने वाले नवाब बहादुर खान के वंश के आखिरी शासक नवाब अब्दुल्ला खान परिवार लड़ाई के नेतृत्व में फर्रुखाबाद चले गए और वर्ष 1729 ज 21 साल की आयु में वापस शाहजहाँपुर आए। उन्होंने बताया कि नवाब हिंदू मुसलमानों के बड़े प्रिय थे। एक बार होली का त्यौहार हुआ तब दोनों समुदायों के लोग उनसे मिलने के लिए घर के बाहर खड़े हो गए और जब नवाब साहब बाहर आए तब लोगों ने होली खेली। बाद में नवाब को ऊंट पर बैठाकर शहर का एक चक्कर लगाया गया। इसके बाद से यह परंपरा बन गई।

उत्कर्ष स्वरूप
डॉ। विकास खुराना ने बताया कि शुरू में बेहद सशक्त व्यवहारपूर्ण रही इस परंपरा का स्वरूप बाद में बिगड़ता ही चला गया और लाट साहब को जूते मारने का रिवाज शुरू कर दिया गया। इस पर आपत्ति भी दर्ज की गई और मामला अदालत में भी पहुंच गया लेकिन न्यायालय ने इसे पुरानी परंपरा बताते हुए इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

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