आज लक्ष्मी पंचमी का पावन उत्सव मनाया जा रहा है। इस दिन विधि- विधान से मां लक्ष्मी की पूजा- अर्चना की जाती है। माता लक्ष्मी की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से आर्थिक समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है।
श्री लक्ष्मी चालीसा (श्री लक्ष्मी चालीसा):
। सोरठा ठा
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननी जगदंबिका वास
। चौपाई।
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही।
ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही वि
श्री लक्ष्मी चालीसा
आप समान निन कोई उपकारी नहीं। सब विधि पुरवहु अस हमारा ह
जय जय जगत जननी जगदंबा सबकी तुम ही अवलंबा ॥1 जग
तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती वही हमारी खासी सी
जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हितकारी हो ॥2 हो
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननी भवानी नि
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी ली3 अपराध
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी सुन
ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारे माता ॥4।
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो िन्
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी ॥5 नि
कब कब जन्म कहाँ प्रभु लीन्हा। रूप बदल जाता है तहँ सेवा कीन्हा की
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥6 ध
तब आप प्रकट जनकपुर मा ही। सेवा
अपनाई गई। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी द7 भु
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहत लौ महिमा कहौं बखानी ौ
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन वांछित वांछित फल पाया ॥8।
तजी छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई भ
और हाल मैं कहौं बुझाई जो यह पाठ करै मन लाई ॥9 मन
ताको कोई दुख नोई। मन वांछित पावै फल सोई फल
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप परम बंधन हारीनी हार10 हार
जो चालीसा पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै सु
ताकौ नो न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ॥11 प
पुत्रहीन अरु संपति हीना। अन्ध बधिर कोधी अति दीना ढ़ी
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै दिल12 न
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करत गौरीसा गौ
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै ॥13 आव
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा और
प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुँ नाहीं ॥14 में
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई ई
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा ॥15 उपज
जय जय जय लक्ष्मी भवानी सब में पैठ हो गुण खानी गुण
तुहरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुँ नाहिं ॥16 लु
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट कटि भक्ति मोहि दीजै मोह
डिफ़ॉल्ट करि क्षमा करें। दर्शन दजै दशा निहारी ॥17 शा
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी छ
नवीन मोहिन ज्ञान बुद्घि में तनाव में है। सब जानत हो अपने मन में ॥18 मन
रूप चतुर्भुज करके धारण। दुख मोर अब करहु निवारण ह
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्घि मोहि नविन अधिकाई ॥19 मोह
। दोहा।
त्राहि त्राहि दुख हरणी, हरो वेलि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नष्ट लक्ष्मी
रामदास धरी ध्यान नित, विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर,
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