Home Breaking News छत्तीसगढ़ : सीआरपीएफ जवान ने सुनाई आपबीती, बताया क्या हुआ था नक्सल हमले के दिन
बलराज सिंह

छत्तीसगढ़ : सीआरपीएफ जवान ने सुनाई आपबीती, बताया क्या हुआ था नक्सल हमले के दिन

by Sneha Shukla

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सार

युवा बलराज सिंह ने कहा कि एसआई साहब के पास ही में आकर ग्रेनेड गिरा और उसके छर्रा उनके पांव में लग गए। पैर में से ब्लीडिंग बहुत ज्यादा होने लगी थी और वे दर्द से चिल्ला रहे हैं कि कोई पट्टी बांधो, कुछ करेंगे ताकि खून बहना रुक जाए किसी तरह से। फर्स्ट एड को बुला रहे थे लेकिन फर्स्ट एड के एसटीएफ के जवान पहले से ही घायल थे। उनकी मरहम पट्टी की जा रही थी। इतने में ये दर्द से बहुत चिल्ला रहे थे तो मैंने अपनी पगड़ी फाड़ी और उसकी पट्टी बना कर उनके पांव में बांध दी।

ख़बर सुनना

सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के युवा बलराज सिंह की आंखों में, शनिवार को बीजापुर में हुई माओवादी हमले की तरह सभी तस्वीरें एक साथ घूमती हैं। बीजापुर के तर्रेम में हुए इस माओवादी हमले में सुरक्षाबलों के 22 जवान मारे गए थे। इसके अलावा 31 घायल जवानों को बीजापुर और रायपुर के अस्पतालों में भर्ती कराया गया था। इन्हीं घायल जवानों में एक बलराज सिंह हैं।

रायपुर के रामकृष्ण अस्पताल में भर्ती बलराज सिंह के पेट में गोली लगी थी। लेकिन इलाज के बाद अब वे खतरे से बाहर हैं। उनकी हृदयुरी के चर्चे सब तरफ हैं। राज्य के विशेष पुलिस महानिदेशक आरके विज ने अस्पताल पहुंच कर बलराम को एक पगड़ी भी भेंट की है। पंजाब के तरनतारन से खडूर साहब रोड पर कोई साढ़े पांच किलोमीटर दूर बाईं ओर कलेर गांव है। बलराज सिंह इसी गांव के रहने वाले हैं।

स्नातक की पढ़ाई कर चुके बलराज सिंह, अक्टूबर 2014 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे और मूल रूप से असम में तैनात हैं। बलराज के परिवार में उनकी तीन बड़ी बहनें हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। पिता पहले दुबई में काम करते थे, अब गांव में रह कर खेती करते हैं। बलराज बताते हैं कि वे शुरू से फौज में जाना चाहते थे। वे कहते हैं कि हमारे तरनतारन में नौजवानों का सपना होता है। फौज में या सीआरपीएफ में या बीएसएफ में। कहीं भी हो, वर्दी पहननी है। पहली पसंद तो आज भी यही है।

कहानी मुठभेड़ की
बलराज सिंह के माता-पिता और उनकी पत्नी अभी गांव में ही हैं और बीजापुर में हुई मुठभेड़ के बाद बलराज उन्हें हर दिन की खबर देते रहते हैं कि अब उनकी तबीयत कैसी है। लेकिन खैरियत जानने के बाद रिश्तेदारों और दोस्तों की राय इस बात में कहीं अधिक रहती है कि उस दिन बीजापुर में हुआ क्या था?

पेट में लगी गोली के घाव अभी हरे हैं, इसलिए मुस्कुराने की कोशिश में भी बलराज सिंह के चेहरे पर दर्द उभर आता है। वे पंजाबी में कहते हैं कि मैं बिल्कुल ठीक-ठाक हूं। सेहत मेरी ठीक-ठाक है। गोली छूने के निकल गए और बहुत ज्यादा नहीं, बस रिकवर हो रहे हैं धीरे-धीरे मैं फिट हूं।

शनिवार को माओवादियों के साथ मुठभेड़ का मंज़र बयान करते हुए उनकी आंखें चमकने लगती हैं। वे बताते हैं कि शुक्रवार को सीआरपीएफ की टीम बांसागुड़ा कैंप से तरम थाने के लिए रात नौ बजे के आसपास गली मोहल्ले में थी। कैंप और थाने के बीच की दूरी लगभग 12-13 किलोमीटर है।

बलराज कहते हैं कि वहां से तकरीबन रात एक-डेढ़ बजे के आसपास हमारा ऑपरेशन शुरू हुआ। पूरी रात चलने के बाद हमारा जो तयशुदा टारगेट था, उसे खोज करने के बाद जब हम वापस आ रहे थे, तो केवल हमारी सवारी रहेगी। मतलब पानी-वानी पीने लगी। एक टेकरी के ऊपर हॉल्ट किया कुछ देर के लिए।
माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन के लिए उस रात सीआरपीएफ़, डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड, स्पेशल टास्क फोर्स और कोबरा बटालियन के 2059 जवानों को लगाया गया था।

इस ऑपरेशन में जिन इलाकों की तलाशी की गई थी, वहां कोई नहीं मिला था। इसके बाद सुरक्षाबलों के जवान आश्वस्त हो गए थे कि आसपास कहीं भी माओवादी नहीं हैं। यूं भी ऑपरेशन खत्म हो गया था और रात भर की थकी-मातादी टीम लौट रही थी। सुबह के लगभग आठ बजे होंगे, जब जवानों की एक टुकड़ी दो-तीन हिस्सों में बंट कर थोड़ी देर के लिए जोन्नागुड़ा की पहाड़ी के पास रुकी थी।

बलराज बताते हैं कि उसी समय एसपी ने टीम लीडर को संदेश भेजा कि आपके आसपास ही नक्सलियों की एक बड़ी टीम घूम रही है, आप सावधान हो जाएं। रात भर भटकने के बाद थोड़ी देर और अपने साथ रखे बिस्किट खाने तक का जब जवानों को नहीं मिला।

टीम ने तुरंत चौतरफा सुरक्षा घेरा बनाया और टेकरी के चारों ओर एक गोला बना कर पोज़ीशन ले ली। यह सब करते हुए सुरक्षाबल के जवानों को बहुत सारे दूसरे लोग भी नज़र आए लेकिन उनमें ज्यादातर आम लोग थे और वे निहत्थे थे। इसलिए सुरक्षाबलों की टीम ने उन पर बहुत ध्यान नहीं दिया।

बलराज कहते हैं कि उसी समय हमारी ऊपर की पहाड़ियों से हमला शुरू हो गया। जो भी इंक में इंप्रोवाइज बम बना रखे हैं, यूबीजूएल के, मोर्टार के, उनमें इंक ने हमला बोल दिया है। इसमें हमारे बहुत से युवा घायल हुए और साथ में एक-दो लोगों की मौत भी हो गई। उसके बाद टेकरी छोड़ कर हम लोग नीचे मैदान की ओर आ गए। तीन-ताराफा हमला था। हम एक तरफ, उनके एंबुश को तोड़ कर इनसे पूरी तरह भिड़ गए।

बलराज और उनके साथी सामने गोलियां बरसाते हुए आगे बढ़ रहे थे लेकिन यह इतना आसान नहीं था। बाहर की तरफ़ से जब फायरिंग हुई तो पहले एसटीएफ के जवान उन्हें खदेड़ने के लिए जा रहे थे। उसके पीछे-पीछे कोबरा बटालियन भी चल दी और जवान माओवादियों के हावी हो गए।

गोलियां चलाते हुए वे आगे बढ़ रहे थे तब सामने के एसटीएफ जवान को गोली लगी। उसके बाद बलराज अपनी पोज़ीशन लेने के लिए एक पेड़ की ओर भागे लेकिन तब तक एक गोली उनके पेट को चीरती हुई निकल चुकी थी।इसके बीच एक नंबर टीम के विजय और नीरज कटियार ने बलराज को संभाला।

बलराज सिंह कहते हैं कि जब टेकलगुड़ा गाँव के पास हम पहुंचे, तब तक मैं भी घायल हो चुका था। मुझे पेट में गोली लगी थी। बाकि के जो जवान ठीक थे, फाइटिंग की हालत में थे, उन्होंने बॉक्स फॉर्मेट बना कर, जो घायल थे उनमें बीच में ले लिया। जो चलने की हालत में नहीं थे, उन्हें चारपाई बना के या जो कुछ उनके पास था, स्ट्रेचर जैसा बना के उन्हें निकाला और चॉपर तक पहुंचाया।

जो जवान ठीक-ठाक थे, उनका सारा ध्यान इस बात पर था कि घायल जवानों को अपने साथ ले कर वे सुरक्षित निकल जाएं। बलराज को जैसे एक-एक दृश्य याद है। वे बताते हैं कि जब वे डालते हैं कि वे जा सकते हैं तो उन्होंने पूरा रास्ता पैदल चलना कर तय किया। उन्होंने अपने साथियों को कहा कि आप लोग मेरी चिंता न करें, आप मुक़ाबला करें क्योंकि माओवादी लगातार पीछा भी कर रहे थे। इसके बाद अन्य सहयोगियों ने माओवादियों से मुकाबला किया। तब तक दिन ढलने लगा था।

बलराज सिंह ने हिम्मत नहीं हारी और अपने साथियों के साथ पैदल चलते हुए वे तीन किलोमीटर दूर सिलगर तक पहुंचे, जहां उन्हें इलाज के लिए छोड़ दिया गया है। बलराज सिंह ने कभी भी किसी मुठभेड़ का सामना नहीं किया था। यह उनके लिए पहला अवसर है लेकिन वे चाहते हैं कि जल्दी ठीक हो कर फिर से मैदान में उतरें, फिर माओवादियों से मुक़ाबले करें।

लेकिन उससे पहले उनकी ख्वाहिश है कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहे तो इस महीने के अंत में अपना जन्मदिन वे अपने परिवार के साथ मनाएं। यह उनके जीवन का 28 वां जन्मदिन है और मृत्यु को मात देकर लौटे हैं, इस लिहाज से पहला जन्म दिन भी।

विस्तार

सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के युवा बलराज सिंह की आंखों में, शनिवार को बीजापुर में हुई माओवादी हमले की तरह सभी तस्वीरें एक साथ घूमती हैं। बीजापुर के तर्रेम में हुए इस माओवादी हमले में सुरक्षाबलों के 22 जवान मारे गए थे। इसके अलावा 31 घायल जवानों को बीजापुर और रायपुर के अस्पतालों में भर्ती कराया गया था। इन्हीं घायल जवानों में एक बलराज सिंह हैं।

रायपुर के रामकृष्ण अस्पताल में भर्ती बलराज सिंह के पेट में गोली लगी थी। लेकिन इलाज के बाद अब वे खतरे से बाहर हैं। उनकी हृदयुरी के चर्चे सब तरफ हैं। राज्य के विशेष पुलिस महानिदेशक आरके विज ने अस्पताल पहुंच कर बलराम को एक पगड़ी भी भेंट की है। पंजाब के तरनतारन से खडूर साहब रोड पर कोई साढ़े पांच किलोमीटर दूर बाईं ओर कलेर गांव है। बलराज सिंह इसी गांव के रहने वाले हैं।

स्नातक की पढ़ाई कर चुके बलराज सिंह, अक्टूबर 2014 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे और मूल रूप से असम में तैनात हैं। बलराज के परिवार में उनकी तीन बड़ी बहनें हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। पिता पहले दुबई में काम करते थे, अब गांव में रह कर खेती करते हैं। बलराज बताते हैं कि वे शुरू से फौज में जाना चाहते थे। वे कहते हैं कि हमारे तरनतारन में नौजवानों का सपना होता है। फौज में या सीआरपीएफ में या बीएसएफ में। कहीं भी हो, वर्दी पहननी है। पहली पसंद तो आज भी यही है।

कहानी मुठभेड़ की

बलराज सिंह के माता-पिता और उनकी पत्नी अभी गांव में ही हैं और बीजापुर में हुई मुठभेड़ के बाद बलराज उन्हें हर दिन की खबर देते रहते हैं कि अब उनकी तबीयत कैसी है। लेकिन खैरियत जानने के बाद रिश्तेदारों और दोस्तों की राय इस बात में कहीं अधिक रहती है कि उस दिन बीजापुर में हुआ क्या था?

पेट में लगी गोली के घाव अभी हरे हैं, इसलिए मुस्कुराने की कोशिश में भी बलराज सिंह के चेहरे पर दर्द उभर आता है। वे पंजाबी में कहते हैं कि मैं बिल्कुल ठीक-ठाक हूं। सेहत मेरी ठीक-ठाक है। गोली छूने के निकल गए और बहुत ज्यादा नहीं, बस रिकवर हो रहे हैं धीरे-धीरे मैं फिट हूं।

शनिवार को माओवादियों के साथ मुठभेड़ का मंज़र बयान करते हुए उनकी आंखें चमकने लगती हैं। वे बताते हैं कि शुक्रवार को सीआरपीएफ की टीम बांसागुड़ा कैंप से तरम थाने के लिए रात नौ बजे के आसपास गली मोहल्ले में थी। कैंप और थाने के बीच की दूरी लगभग 12-13 किलोमीटर है।

बलराज कहते हैं कि वहां से तकरीबन रात एक-डेढ़ बजे के आसपास हमारा ऑपरेशन शुरू हुआ। पूरी रात चलने के बाद हमारा जो तयशुदा टारगेट था, उसे खोज करने के बाद जब हम वापस आ रहे थे, तो केवल हमारी सवारी रहेगी। मतलब पानी-वानी पीने लगी। एक टेकरी के ऊपर हॉल्ट किया कुछ देर के लिए।

माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन के लिए उस रात सीआरपीएफ़, डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड, स्पेशल टास्क फोर्स और कोबरा बटालियन के 2059 जवानों को लगाया गया था।

इस ऑपरेशन में जिन इलाकों की तलाशी की गई थी, वहां कोई नहीं मिला था। इसके बाद सुरक्षाबलों के जवान आश्वस्त हो गए थे कि आसपास कहीं भी माओवादी नहीं हैं। यूं भी ऑपरेशन खत्म हो गया था और रात भर की थकी-मातादी टीम लौट रही थी। सुबह के लगभग आठ बजे होंगे, जब जवानों की एक टुकड़ी दो-तीन हिस्सों में बंट कर थोड़ी देर के लिए जोन्नागुड़ा की पहाड़ी के पास रुकी थी।

बलराज बताते हैं कि उसी समय एसपी ने टीम लीडर को संदेश भेजा कि आपके आसपास ही नक्सलियों की एक बड़ी टीम घूम रही है, आप सावधान हो जाएं। रात भर भटकने के बाद थोड़ी देर और अपने साथ रखे बिस्किट खाने तक का जब जवानों को नहीं मिला।


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और पेट को चीरती गोली निकल गई



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