हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार नरेंद्र कोहली हमारे बीच नहीं रहे। वह कोरोना महामारी की चपेट में थे और पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के अस्पताल में इलाज करवा रहे थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य में जो द्वार खोला था, उसे नरेंद्र कोहली ने विस्तार दिया था। मिथकीय चरित्रों, ऐतिहासिक-पौराणिक कथाओं को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखने व उनकी तर्कसंगत व्याख्या करने में उनकी कोई सानी नहीं। महाकाव्यात्मक उपन्यास विधा को शुरू करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। उनके जाने से हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई है। उन्हें याद कर रहे हैं कि सिद्धांत और लेखक प्रेम जनमेजय हैं
नरेंद्र कोहली एक युगपर्वतक साहित्यकार थे जिन्होंने उच्च जीवन मूल्यों की स्थापना के लिए लेखकीय कलम उठाई। उन्होंने पहली बार रामकथा को उपन्यास श्रृंखला के रूप में लिखा। तुलसी के बाद में उन्होंने रामकथा को न केवल जनमानस में पहुंचचांया अपितु राम के रूप में हमारे समय के अनुरूप एक आदर्श जननायक दिया। ऐसी जननायक जो हमारी संस्कृति को को नई उंचाई दे सके। 1975 जब दीक्षा जब प्रकाशित आई आई थी तो इसका बहुत स्वागत हुआ। भगवती चरण वर्मा, यशपाल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, जैनेंद्र कुमार, डॉ। धर्मवीर भारती आदि ने इसकी मुक्तकंठ से प्रशंसासा की। आचार्य हारीप्रसाद द्विवेदी ने रामकथा को बिल्कुल नई दृष्टि से देखने वाली कृति कहा। भगवती चरण वर्मा ने लिखा था- मैंने आपमें वह प्रतिभा देखी है जो आपको हिंदी के प्रमुख साहित्यकारों में लाती है। जैनेंद्र कुमार ने कहा- आपकी रचना उपन्यास से ऊंचे उठकर कुछ शास्त्र की कथा तक बढ़ जाती है।)
पर प्रकाशन से पूर्व इस कृति को अत्यधिक उपेक्षा झेलनी पड़ी थी। उन दिनों ‘धर्मगो’ ने न केवल नरेंद्र कोहली की ‘परिणति’ जैसी कहानियों को प्रकाशित किया अपितु ‘रूपति’ संकलन की समीक्षा भी प्रकाशित की। ‘बैठे थले’ में वे उन दिनों छाए हुए थे। पर विदंबना देखिए ‘मानस का हंस’ छापने वाले उसी ‘धर्मगो’ ने ‘दीक्षा’ यह कहकर लौटाई कि हम ऐतिहासिक-पौराणिक उपन्यास छापने की स्थिति में नहीं है। दु राजीव साप्ताहहदुस्तान ’को कुछ अंश भेजे तो लौटती डाक से लौट आए। इसके बाद नरेंद्र कोहली लघु पत्रिकाओं की ओर मुड़े। कार कहानी ’, कहानी कहानीकार’, प्रतीक नया प्रतीक ’, आदि शब्द’ आदि डेढ़ दर्जन संस्करणों में अंश प्रेषित। इन सबने ससम्मान अंश प्रकाशित किए। यही नहीं ‘दीक्षा’ की पंडुलिपि प्रकाशकों के द्वारे-द्वारे अपित होने को विवश हुआ। इसी दीक्षा की पांडुलिपि सभी महत्वपूर्ण प्रकाशकों द्वारा लौटाई गयी थी। पराग प्रकाशन उन दिनों आंरभ ही हुआ था। तूफानश नरेंद्र कोहली ने प्रकाशक श्रीकृष्ण के समक्ष रामकथा ‘दीक्षा’ को अपना पैसा लगाकर छापने का प्रस्ताव दिया। श्रीकृष्ण ने पढ़ा है और रामकथा को अपनी कली से छापने को तैयार हो गए हैं।
‘दीक्षा’ में नरेंद्र कोहली की स्थापना है कि विश्वमित्रा से राम को राक्षसी संस्कृति का विनाश करने की दीक्षा मिली और वनवास उनके लिए अवसर था। अहल्या शिला नहीं, विलासी इंद्र के प्रभाव के कारण शिलावत जीवन जी रही थी। इंद्र का विरोध करने का कोई में साहस नहीं था। राम में साहस था। राम ने कहा अहल्या नहीं इंद्र दोषी है। राम ने अहल्या को समाज में पुन: सम्मान दिलाया। इसके बाद तब उनकी पेंसिल रुकी नहीं। आठ खंडों के महासमरिंगखला, विवेकानंद पर ‘ब्रेको कारा ब्रेको’ श्रृखला। और व्यंग्य साहित्य। उसमें उन्होंने जितने शिल्पगत प्रयोग किए किसी ने नहीं किया। पांच एब्सर्ड उपन्यासों की प्रशंसा द्विवेदी जी ने भी की थी।
सातवीं कक्षा में कबीर का दोहा, गुरु र्गोंवद दोउ खड़े, पढ़ा तो बस पढ़ा क्योंकि गुरु के बारे में इतना ही जानते थे कि गुरु काम न करने पर कान उमेठता है, मछली बनाता है और अधिक क्रोधित हो – बेंत से भी पीटता है। यह ज्ञान न था कि वह किस र्गोंवद से मिलाता है और र्गोंवद से मिलने के क्या लाभ होते हैं। हम तो उस र्गोंवद को ही जानते भर थे जिनके सामने मां सर नवाने को कहती और परीक्षा में पास होने पर जिनके नाम से प्रसाद बांटना होता था। युवावस्था में शिक्षा के महत्व ने जब परिश्रम करवाया और बार-बार अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए गुरु के समक्ष जाने को विवश किया तो गुरु का महत्व समझ में आया। जीवन की कठिन राह पर अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए गुरु का महत्व निरंतर आवश्यक लगने लगा। यह समझ में आया कि कबीर का यह दोहा विद्यालयी परीक्षा के लिए रटने की वस्तु नहीं है अपितु जीवन की परीक्षा में सफल होने की कुंजी है। यह भी समझ में आया कि गुरु ने क्यों र्गोंवद के पायं लगने को कहा है। गुरु दो प्रकार के होते हैं- एक गुरु र्गोंवद दोउ खड़े जैसा और दूसरा जाका गुरु भी वंशला चेला खरा निरूपित जैसा। दोनों गुरु मारग पर डालते हैं। अंधा गुरु अपने मारग पर उपयोग करता है जो गुरु तक पहुंच कर खत्म हो जाता है। बलिहारी गुरु र्गोंवद के सत्य मार्ग पर चलती है। सतगुरु मिल जाए तो शिष्य का जीवन सुधर जाता है, उसे सही मार्ग मिल जाता है। अन्यथा संत शिष्यों के कंधों पर चढ़े गुरु से र्गोंवद बने अपना जीवन सुधारते हैं और उन्हें अपने का सच्चा मार्ग मिल जाता है।
‘मेरे लिए सतगुरु सरीके थे नरेंद्र कोहली’
नरेंद्र कोहली मेरे लिए सतगुरु थे जो न तो स्वयं अंधत्व धारण करते थे और न ही शिष्यों को अंधत्व धारण करने की राह में धकेलते हैं। यह नरेंद्र कोहली की कृपा है कि उन्होंने मुझे जैसे नालायकलों को अपने आसपास फटकने दिया। गुरु तो सतगुरु है और मैं चेला खर्रा निरंधित था / हूं। उन्होंने इस निरस्त चेले पर कृपा की और अपने जीवन का कुछ हिस्सा मुझे भी दिया। लेखन नरेंद्र कोहली के जीवन की प्राथमिकता रही जिसके लिए वे किसी भी प्रकार का मोह त्याग कर सकते थे। इस प्राथमिकता के कारण ही सन् 2008 में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। डॉ। नगेंद्र ने उनकी पत्नी से सक्रोध कहा- नरेन्द्र का दिमाग खराब हो गया है। पढ़ाते हुए भी लेखन किया जा सकता है। मैंने किया है उसे कहो, बलिदानपत्र वापिस ले। ‘ पर इस अर्थ में नरेन्द्र कोहली जिद्दी थे।
नई पीढ़ी को नरेंद्र कोहली ने दिए थे लेखन के संस्कार
मुझे प्रसन्नता है कि मेरे जीवन को एक लक्ष्य देने और उसे सार्थक दिशा प्रदान करने का खोलने नरेन्द्र कोहली जैसे व्यक्तित्व के द्वारा हुआ। अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मैंने जो पगडंडी को चुना, वह सही लक्ष्य तक पहुंच गया। यहाँ से मुझे कई पगडंडिया मिलीं- लेखक मंडल, अतिमर्स, माधुरी, धर्मगो, गोष्ठी, सार्थक, पी.एचडी, विवाह, लेक्चररशिप, साहित्यिक गोष्ठी, पुस्तकों के प्रकाशन आदि की पगडंडियाँ। नरेंद्र कोहली मेरे लिए एक सक्रिय पाठशाला की तरह रहे। इस पाठशाला में मैंने निरंतर कुछ सीखा। नरेंद्र कोहली से मुझे ही नहीं कई लोगों को लेखन का संस्कार मिला है। हम लोग जब साहित्य की वर्णमाला भी नहीं जानते थे, घुटनों चलना भी नहीं जानते थे, उन्होंने श्रम की घुट्टी पिलाकर नन्हे-नन्हे कदम चलना सिखाया। नरेंद्र कोहली का मेरे लेखकीय विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। लेखन उनके लिए मिशन था, जुनून था और जीवन की प्राथमिकता थी।
घुटनों चलना सीखने वालों के भी सहायक थे नरेंद्र कोहली
लेखक के रूप में प्रेमचंद उनके आदर्श रहे। लेखन को प्राथमिकता देने का संस्कार नरेंद्र कोहली ने प्रेमचंद के जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर समेकित किया है। हमारे छात्र काल में वे अकसर प्रेमचंद के उदाहरण देते थे। जैसे कि प्रेमचंद एक हाथ से लिख रहे हैं और दूसरे से गोद में बैठे बच्चे को थपका भी रहे हैं। नरेंद्र कोहली अपने आरंभिक काल में न केवल अपनी लेखन के प्रति सजग रहे अपितु उन नवलेखकों के भी सजग- सहायक होने वाले जोनों चलना सीख रहे थे। नई खोज की रचनाओं को शुद्धता से ठीक करना, उनकी भाषा दोषों को सुधारना। नरेंद्र कोहली ने ये परंपरा अपने गुरु चंद्रभूषण सिन्हा से ग्रहण की। इसी परंपरा के तहत उन्होंने कॉलेज में लेखक-मंडल की गोष्ठियां आरंभ की।
वे जिद्दी स्वभाव के थे। संभवत: इसी कारण वे महायात्रा के लिए निकल गए, किसी की नहीं सुनी।
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