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Covid-19 vaccine: अचानक क्यों उठने लगे 'वैक्सीन मैत्री' पर सवाल

Covid-19 vaccine: अचानक क्यों उठने लगे ‘वैक्सीन मैत्री’ पर सवाल

by Sneha Shukla

<पी शैली ="पाठ-संरेखित करें: औचित्य;"> भारत का वैक्सीन मैत्री कार्य्रकम अब तक कूटनीतिक और मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा था। दुनिया के 86 देशों को गया 6.47 करोड़ वैक्सीन डोज़ की मदद को दुनिया के मंच पर भारत के छवि निर्माण और संबंधित सुधार की इन्सटलांट्स की तरह देखा जा रहा था। दूरदराज़ तक दोस्तों के घर जाती टीएसी की खेप और बारी में मिलते हैं तालियां ठीक समीकरण बना रही थीं। मगर भारत के भीतर अचानक से बढ़े कोरोना मरीज़ों के आंकड़े ने अभी तक निहाल कर रही वैक्सीन मैत्री को अब अपने ही लोगों के बीच खलनायक बना दिया है।

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दरअसल, वैक्सीन मैत्री विचार का जन्म हुआ कोरोना काल में ही बीते साल हैड्रोक्ससीक्लोरोक्वीन दवा को लेकर जन्म में मचे हाहकार और भारत को मिली आपूर्ति संख्या की सुनामी के बीच। अमेरिका सहित दुनिया के ताकतवर देश भी भारत से मुंहमांगे दाम पर यह दवा हासिल करना चाहते थे।

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हालांकि, मलेरिया की दवा हैड्रोक्ससीक्लोरोक्वीन कोरोना पर तो कोई विशेष कुशल नहीं हुआ। लेकिन इसने भारत को दुनिया की फार्मेसी के तौर पर अपनी छवि निर्माण का नया मौका दिया। वह भी ऐसे समय जब फार्मा क्षेत्र का उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी चीन कोरोना की पैदापन को लेकर कठघरे में खड़ा था।

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लिहाज़ा प्रधानमंत्री ने सँयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक से लेकर घरेलू मोर्चे पर हुई चुनावी रैलियों तक इस बात का ज़िक्र क़ई बार किया कि कैसे दुनिया भारत की तरफ उम्मीदवल भरी नजरों से देख रही है और किस तरह दुनिया की दवाखाना बनकर भारत सबकी ज़रूरत पूरी कर रही है। को तैयार है। सो, भारत में वैक्सीन आमद की तेज होती सुगबुगाहट के साथ साथ 2020 की आखिरी तिमाही में ही वैक्सीन मैत्री के लिए जमीन तैयार करने की शुरुआत कर दी थी। दुनिया के क़ई देशों के राजनयिकों को पुणे और हैदराबाद ले जाया गया, वैक्सीन निर्माण फैसेलिटीज़ दिखाई दिया।

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साथ ही सरकार में शीर्ष स्तर पर मिली। मंजूरी के बाद 2020 के आखिरी हफ्तों में अंदर विदेश मन्त्रालय और केंद्रीय मंत्रालय में इसे एक व्यापक कर्यक्रम की तरह आगे बढाने की योजना बनाई गई। जिसमें भारत निर्मित टीके के साथ और nbsp; भारतीय नेतृत्व की उदरता, देश की उत्पादन क्षमता को बताने-जताने के साथ ही व्यावसायिक तौर पर देसी फार्मा क्षेत्र के लिए नए उत्पाद बनाए जाते हैं। यह योजना बहुत वाजिब भी थी और तन्हा भी।

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हालांकि इस व्यापक योजना की मीनार उस गणित पर टिकी थी जिसमें कोरोना के मामलों का ग्राफ नीचे गिरता रहा या एक निश्चित सीमा में ही रहा। जनवरी से मार्च के मध्य तक भी ऐसा हुआ। फरवरी 2021 में भारत में हर दिन सामने आने वाले कोरोना मामलों का आंकड़ा केवल 16 हज़ार के करीब था। लगभग इसी तरह भारत ने हज़ारों की संख्या में वैक्सीन की खेप अन्य देशों को भीज़ है। यानि भारत के पास खुले दिल और खुले हाथ से वैक्सीन मैत्री धारणाने का मौका भी था और गुंजाइश भी।

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बड़ी धूमधाम से क्यूई आंतरिक बैठकों में भारत के राजनयिकों और अन्य लोगों ने ब्रांड वैक्सीन मैत्री की मार्केटिंग की। इतना ही नहीं खुद प्रधानमंत्री भी जब कोविंद की अपनी पहली विदेश यात्रा में बांग्लादेश गए तो तोहफे के तौर पर पड़ोसी मुल्क के लिए 12 लाख वैक्सीन डोज़ की सौगात ले गए थे।

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हालांकि 15 मार्च के बाद बेहद तेजी से बढ़ने के मामलों ने सरकार के वैक्सीन मैत्री प्लान पर चिंता की लकीरें खींचना शुरू कर दी थी। मार्च के आखिरी सप्ताह में जब कोरोना मरीज़ों का आकांड़ा 65 हज़ार प्रतिदिन को पार कर गया तो धीरे धीरे कर तोहफ़ों में ही नहीं बड़ी वैक्सीन आपूर्ति सेवा पर भी रोक लगाई गई। सरकार ने इस रोक का कोई औचित्य तो जारी नहीं किया। लेकिन 1 अप्रैल के बाद 45 साल से। अधिक आयु वालों के टीकाकरण की बढ़ी जरूरत का हवाला देते हुए अलिखित पाबंदी लगा दी गई।

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हालांकि, वैक्सीन मैत्री और हैड्रोक्ससीक्लोरोक्वीन के जब दी गई मदद में एक मूलभूत अंतर उत्पादन का भी था। हैड्रोक्ससीक्लोरोक्वीन एक परम्परागत दवा है जिसका भारत में क्यूई उत्पादक हैं। लेकिन कोविशील्ड या कोविक्सीन का उत्पादन विशिष्ट कंपनियों में ही कर रहे हैं और वह भी एक निर्धारित क्षमता के साथ। ऐसे में इस बात का खतरा बरकरार है कि देश और दुनिया इसकी अगर पसंद बढ़ रही है तो उसकी कम उत्पादन इकाइयों को झेलना होगा। साथ ही सरकार की पहल.होने के कारण वैक्सीन मैत्री पर भी छींटे आते लसमी है।

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आंकड़े बताते हैं कि देश से बाहर गए टीएसी की संख्या 6.47 करोड़ है और भारत में लोगों को अब तक दिए गए टीकों का आंकड़ा 10 करोड़ से अधिक है। बाहर भेजे गए टीके में भी वैक्सीन गिफ्ट 1.05 करोड़ है। इसमें भी ज्यादातर बंगलादेश नेपाल म्यांमार जैसे पड़ोसी हैं जिनके साथ भारत की सीमा मिलती है। यानि अगर वहाँ कोरोना बहुत अधिक फैला है तो हम भी सुरक्षित नहीं हैं।

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लगभग 3.45 करोड़ टीके अन्य देशों ने भारत से पैसे देकर खरीदे हैं। जबकि WHO के एग्जेक्युटिव बोर्ड का प्रमुख होने के साथ एक जिम्मेदार देश होने के नाते भारत का एक आंतरिक कमिटमेंट है। इसलिए COVAX कार्यक्रम में 1.81cr टीके दिए गए। मार्च 2021 के बाद किसी भी देश को बड़ी सँख्या में टीकों की आपूर्ति नहीं की गई है। सिवाय नौरू जिसे 6 अप्रैल को 10 हज़ार और पराग्वे जिसे गत 26 मार्च को एक लाख डोज़ दिया गया।

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