इकोवाच ने सुप्रसिद्ध संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व स्तर पर मांस उत्पादन पर्यावरण के लिए विनाशकारी है और 2050 तक मांस उत्पादन विश्व पर्यावरण को विनाश की जिस स्थिति में पहुंच जाएगा, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मांस उद्योग में भी जलवायु के लिए सबसे विनाशकारी गोमांस उद्योग है। भारत ने गोहत्या पर प्रतिबंध लगाकर जलवायु नियमन को बड़ी राहत दी है, जिसकी दुनिया भर के पर्यावरणविद और जलवायु वैज्ञानिक सराहना करते हैं।) इकोवाच का मानना है कि शाकाहार केवल अहिंसक ही नहीं, हमारी धरती को बचाने के लिए भी आवश्यक है।
आज जो हमारे समकालीन विश्व की स्थिति है, उसे तैयार करने में सबसे योगदान हमारे भोजन का है। आने वाले भविष्य का भाग्य भी अधिकांशत: हमारे खान-पान के हाथों लिखा जाना है। मानव धरती पर सर्वव्यापी है। जहाँ कभी कोई जीव-जंतु, पेड़-पौधा और यहाँ तक कि जीवाणु-विषाणु तक नहीं पनप पाए, वहाँ तक मानव ने अपने पैर पसार लिए हैं। अगर सृष्टि का कोई कटुतम सत्य है, तो वह यह है कि मानव प्रजाति अन्य सभी लाखों वस्तुओं से भी बड़ी उपभोक्ता है। धरती पर जो भी कुछ खाने योग्य है, उसके भक्षण का सबसे पहला अधिकार आदमी ने अपने नाम कर लिया है।
हम सर्वभू हैं। आदमी कंद-मूल-फल, अनाज, सब्जियाँ, मेवों से लेकर पक्षियों, सरीसर्पों, उभयचरों, मछलियों, केकड़ों, कीट-पतंगों तक का भक्षण कर जाता है। यह सर्वभक्षिता मानव के नैसर्गिक विकास की परिधि तो तोड़ ही रही है, दुनिया को भी सर्वनाश की ओर ले जा रही है। पृथ्वी पर जीव-जंतुओं की आबादी बिल्कुल प्रकाश संश्लेषण द्वारा निर्धारित होती है। ऊर्जा का पिरामिड सदैववर्ड होता है।
जैवमंडल में सर्वाधिक जैव ऊर्जा प्रकाश संश्लेषण करने वाले पेड़-पौधों में होता है। सभी जंतु और संपूर्ण मानव समाज समान ऊर्जा के सहारे जीवन यापन करते हैं। ऊर्जा के पारिस्थितिक पिरामिड का आधार वनस्पति से शजित होता है। दूसरे शब्दों में, वनस्पतियों की ऊर्जा अंततोगत्वा सूर्य की ऊर्जा का ही जैव-रासायनिक रूप है, जो हरे पौधों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा रूपांतरित होता है। पारिस्थितिक विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि पहले खाद्य स्तर (यानी उत्पादकों) पर निर्भर जंतु सबसे स्थिर और सबसे स्वस्थ हैं और उन पर अस्तित्व का संकट केवल आ सकता है, जब प्रकाश संश्लेषण, अर्थात पौधों द्वारा स्वयं अपना भोजन बनाने की प्रक्रिया का ही। अंत हो जाएगा।
इसके विपरीत उच्च मांसाहारी जानवरों पर अस्तित्व का संकट इतना गहरा गया है कि उनकी कई प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं और शेर, बाघ, चील जैसे उच्च मांसाहारी जीव लुप्तप्राय होने के कगार पर हैं। यह कहना और इसके अनुरूप और वैज्ञानिक आधार पर अधिक सटीक होगा कि प्रकाश संश्लेषक (उत्पादकों) के बाद सबसे स्थिर और स्वस्थ आबादी उन जंतुओं की होगी, जो प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया के निकटस्थ हैं, जैसे सभी शाकाहारी, और जैसे ही जानवर प्रकाश संश्लेषण से दूर। होते जाते हैं, उनके अस्तित्व का संकट उतना ही गहराता जाता है।
सभी जानवरों की अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति के अनुसार खाते हैं। उनके पास कोई विकल्प नहीं है। एक बाघ मर जाएगा, लेकिन घास नहीं खा सकता है। एक गाय खाने की अपनी स्वाभाविक प्रकृति के साथ प्रतिबद्धता करने के बजाय मौत पसंद करेगी। शाकाहारी होने का अर्थ है प्रकृति की जैव विविधता से अपना पोषण करना। लगभग 5,000 साल पहले हम अपने खाद्य पदार्थों को 5,000 प्रकार के पौधों से प्राप्त करते थे। भोजन प्रदान करने वाले पौधों की विविधता आज सिकुड़ गई है, लेकिन अब भी हमारे पास कईानेक शाकाहारी विकल्प हैं।
चीन से कोरोना दुनिया भर में कितना फैला, इसके पीछे तीन कारण बताए जा रहे हैं: या तो चमगादड़ से, या पैंगोलिन से या मीट मार्केट से। जो भी हो, किसी भी तरह से यह वायरस जानवरों के माध्यम से ही है। हम यह भी जानते हैं कि पौधों के बैक्टीरिया, वायरस या अन्य कोई बीमारी मानव में नहीं आती है, लेकिन जानवरों के रोग मनुष्य में सीधे चले जाते हैं। कोरोना काल में मानव आहार को लेकर बहुत चर्चाएँ हुई हैं, और स्वास्थ्य संबंध को लेकर सभी चर्चाओं के केंद्र में वनस्पति रही है।
कोरोना की विश्वव्यापी महामारी में सबसे बड़ा मंत्र है, हमारी प्रतिरोध क्षमता। अच्छी तरह से पोषित शाकाहारियों की प्रतिरोध क्षमता निश्चित रूप से मांसाहारियों की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। सतरंगी प्रकाश से सिंथेटिककृत भोजन के रसमयी स्वाद, पोषक तत्व और उसकी मनभावन खुशबू हमारी मनुष्यता के भावों को जागृत करते हैं और हमारी, शारीरिक और बौद्धिक क्षमताओं, हमारी मनोविज्ञान, सौंदर्य बोध और भावनात्मक तंत्रिकी को पुष्ट करते हैं, हमारी आत्मा को चरम तृप्ति प्रदान करते हैं। करते हैं।
सुप्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने एक बार कहा था: ‘मेरा पेट मरे हुए जानवरों का कब्रिस्तान नहीं है।’ मांस प्राप्त करने के लिए पशुओं पर की गई हिंसा और उनके वीभत्स कत्लेआम के लिए मांसाहारी लोग ही दोषी हैं। उपभोग की मानव विधा हमारी पृथ्वी और हमारे ब्रह्मांड को प्रभावित करने वाली है। शाकाहार का अर्थ है, प्रकाश की प्रचुरता के साथ जीना। शाकाहारीर प्रकाश का मानवीय कृत्य है और मानव समाज की सर्वोत्तम फिलोसॉफी।
– पूर्व प्रोफेसर, जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय
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